भोपाल/सीधी /रतलाम । मध्यप्रदेश के पूर्व नेता प्रतिपक्ष एवं चुरहट विधायक अजय सिंह राहुल भैया ने प्रदेश की टोल नीति और टोल कंपनियों के वित्तीय संचालन को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया है। उन्होंने लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह को पत्र लिखकर भोपाल–देवास जावरा–नयागांव तथा लेबड़–जावरा टोल परियोजनाओं की वित्तीय स्थिति कानूनी वैधता और टोल वसूली की निरंतरता पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। अजय सिंह का दावा है कि उपलब्ध ऑडिट रिपोर्ट और विधानसभा में सरकार द्वारा दिए गए जवाब स्पष्ट बताते हैं कि संबंधित टोल कंपनियां लगातार भारी मुनाफा कमा रही हैं। ऐसे में जनता से टोल वसूली जारी रखना कई सवाल खड़े करता है।
अजय सिंह ने कहा कि यदि कंपनियां वास्तव में घाटे में होतीं तो उनके शेयर करोड़ों रुपये के प्रीमियम पर नहीं बिकते विदेशी निवेशक उनमें निवेश नहीं करते कंपनियां नियमित रूप से आयकर और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पर खर्च नहीं करतीं और न ही शेयरधारकों को करोड़ों रुपये का लाभांश वितरित कर पातीं। उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनियों की वित्तीय स्थिति स्वयं यह साबित करती है कि परियोजनाएं लाभकारी हैं।
उन्होंने पत्र में उल्लेख किया कि भोपाल–देवास टोल परियोजना के शेयरों का मूल्यांकन नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने फरवरी 2023 में ₹10 अंकित मूल्य वाले प्रत्येक शेयर का बाजार मूल्य ₹126691 निर्धारित किया था। वहीं जावरा–नयागांव परियोजना में अशोका कंस्ट्रक्शन लिमिटेड ने लगभग ₹287 करोड़ के शेयर ₹691 करोड़ में स्थानांतरित किए। उनके अनुसार यह सौदे स्वयं कंपनियों की मजबूत आर्थिक स्थिति का प्रमाण हैं।
अजय सिंह ने वित्तीय आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2018-19 से 2023-24 के बीच भोपाल–देवास परियोजना का ऑपरेटिंग प्रॉफिट ₹90.87 करोड़ से बढ़कर ₹194.82 करोड़ तक पहुंच गया। इसी अवधि में प्रति इक्विटी शेयर आय भी कई गुना बढ़ी। वर्ष 2023-24 और 2024-25 में कंपनी ने क्रमशः ₹117.84 करोड़ और ₹83.25 करोड़ का लाभांश वितरित किया तथा सीएसआर गतिविधियों पर भी करोड़ों रुपये खर्च किए।
उन्होंने सरकार के 11 मई 2017 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि बीओटी अनुबंध के अनुसार प्रमोटरों के पास न्यूनतम 26 प्रतिशत शेयरधारिता रहना आवश्यक था जबकि तीनों परियोजनाओं में प्रमोटर वर्ष 2015-16 में ही अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचकर बाहर हो गए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार अनुबंध की इतनी महत्वपूर्ण शर्त में बदलाव स्वीकार कर सकती है तो लागत से कई गुना अधिक टोल वसूली होने के बावजूद टोल समाप्त करने का निर्णय क्यों नहीं लिया जा रहा।
अजय सिंह ने विभाग द्वारा प्रस्तुत कुल वास्तविक व्यय की अवधारणा पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि बीओटी अनुबंध और कंपनियों की ऑडिटेड बैलेंस शीट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। उनके अनुसार यह केवल चार्टर्ड अकाउंटेंट के प्रमाण पत्र के आधार पर तैयार किया गया अनऑडिटेड आंकड़ा है जिसका उपयोग जनता को भ्रमित करने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने विधानसभा प्रश्न क्रमांक 1270 दिनांक 3 मार्च 2023 का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार स्वयं स्वीकार कर चुकी है कि चार्टर्ड अकाउंटेंट के ऐसे प्रमाण पत्र का अनुबंध में कोई उल्लेख नहीं है तथा बीओटी अनुबंध में लाभ या हानि का पूरा जोखिम निवेशकर्ता का होता है।
पत्र के माध्यम से अजय सिंह ने सरकार से पूछा है कि जब अनुबंध में लागत के पुनर्मूल्यांकन अथवा चार्टर्ड अकाउंटेंट के प्रमाण पत्र का कोई प्रावधान नहीं है तब आखिर किस वैधानिक आधार पर टोल वसूली लगातार जारी रखी जा रही है। उन्होंने मांग की कि सरकार पूरे मामले में पारदर्शिता बरतते हुए जनता के सामने स्पष्ट करे कि टोल वसूली जारी रखने का कानूनी आधार क्या है और लाभकारी परियोजनाओं में जनता को राहत देने के लिए अब तक कोई निर्णय क्यों नहीं लिया गया।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत