लघुकथा
दीपावली की रात थी। पूरा गाँव दीपों की रोशनी से जगमगा रहा था। हर घर का आँगन दीयों से आलोकित था। बच्चे पटाखे चला रहे थे और हर चेहरे पर खुशियों की चमक थी। चारों ओर उत्सव और उल्लास का वातावरण था।
लेकिन उसी गाँव के किनारे बनी एक टूटी-फूटी झोपड़ी में एक वृद्ध माँ अकेली बैठी थी। उसके घर में न कोई दीपक था, न मिठाई और न ही कोई अपना। बेटा रोज़गार के सिलसिले में परदेस गया हुआ था और पति को गुज़रे कई वर्ष बीत चुके थे। अँधेरी झोपड़ी में बैठी वह दूर से गाँव की जगमगाहट निहार रही थी। उसकी आँखों में अकेलेपन और बेबसी की उदासी साफ झलक रही थी।
तभी अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने दरवाज़ा खोला तो सामने गाँव का ही एक नन्हा बालक शिवांश खड़ा था। उसके हाथों में एक जलता हुआ दीपक, थोड़ी-सी मिठाई और एक नई साड़ी थी।
शिवांश ने मुस्कुराते हुए कहा, "माँ! आज दीपावली है। आपका घर अँधेरे में कैसे रह सकता है? मुझे तो यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।"
उस मासूम बच्चे ने अपने नन्हे हाथों से वृद्ध माँ की झोपड़ी में दीपक जलाया और उसे मिठाई तथा नई साड़ी भेंट की। दीपक की छोटी-सी लौ ने झोपड़ी का अँधेरा तो मिटाया ही, साथ ही उस वृद्ध माँ के जीवन में भी खुशियों की एक नई रोशनी भर दी। उसकी आँखों से बरसों का दर्द आँसुओं के रूप में छलक पड़ा। उसने शिवांश को सीने से लगा लिया और ढेरों आशीर्वाद दिए।
शिवांश ने सहज भाव से कहा, "माँ! दीपावली तभी सार्थक है, जब हम एक दीपक वहाँ भी जलाएँ, जहाँ आज भी अभाव और बेबसी का अँधेरा है।"
उस रात पूरे गाँव में हजारों दीपक जल रहे थे, लेकिन सबसे अधिक रोशनी उस छोटी-सी झोपड़ी में जल रहे दीपक से फैल रही थी। क्योंकि वह दीपक केवल मिट्टी और तेल से नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और मानवता की भावना से प्रज्वलित हुआ था।
सच ही है, दीपावली केवल अपने घर को रोशन करने का पर्व नहीं, बल्कि किसी और के जीवन से अँधेरा मिटाने का भी नाम है।