भोपाल / रतलाम / सैलाना । देशभर में शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम के तहत शिक्षण गुणवत्ता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद अब वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को भी टीईटी की कसौटी पर खरा उतरना पड़ सकता है। इस फैसले का असर मध्यप्रदेश सहित देश के लाखों शिक्षकों पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2005 से पहले सीधी भर्ती के माध्यम से नियुक्त हुए शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य माना गया है। वहीं वर्ष 2005 से 2009 के बीच भर्ती हुए शिक्षकों की स्थिति को लेकर अभी कानूनी विशेषज्ञों के बीच मंथन जारी है। उस अवधि में व्यापम द्वारा शिक्षक पात्रता परीक्षा के आधार पर भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी, ऐसे में इन शिक्षकों को दोबारा टीईटी देना होगा या नहीं इस पर अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है।
इधर शिक्षकों की चिंताओं को देखते हुए मध्यप्रदेश शासन ने राहत देने वाले दो महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। पहला अब टीईटी परीक्षा का आयोजन व्यापम अथवा किसी अन्य एजेंसी के बजाय लोक शिक्षण संचालनालय (डीपीआई) स्वयं करेगा। इसके साथ ही परीक्षा की तैयारी के लिए ऑनलाइन अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने की भी तैयारी की जा रही है जिससे शिक्षकों को सुविधा मिल सके।
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ऐसे शिक्षक जिनकी सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष या उससे कम का समय शेष है उन्हें टीईटी परीक्षा से छूट मिल सकती है। इसका सीधा लाभ 57 वर्ष या उससे अधिक आयु के शिक्षकों को मिलने की संभावना है।
सूत्रों के मुताबिक सरकार टीईटी उत्तीर्ण करने के लिए शिक्षकों को कई अवसर देने की तैयारी में है जिससे बड़ी संख्या में शिक्षक या तो परीक्षा पास कर सकेंगे या फिर आयु सीमा के कारण छूट के दायरे में आ जाएंगे। अधिकांश प्रभावित शिक्षक 50 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के बताए जा रहे हैं।
शिक्षक संगठनों का मानना है कि सरकार के ये कदम शिक्षकों के हित में हैं और इससे लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को राहत मिलेगी। हालांकि अंतिम तस्वीर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और राज्य सरकार की आगामी अधिसूचनाओं के बाद ही साफ हो सकेगी। फिलहाल टीईटी का मुद्दा एक बार फिर शिक्षा जगत में बहस और चिंता का विषय बन गया है।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत