रतलाम / बाजना
आदिवासी संस्कृति, सामुदायिक एकता और प्रकृति संरक्षण की अनूठी मिसाल शुक्रवार को बाजना क्षेत्र में देखने को मिली, जब रामपुरिया, बगली और घोड़ाखेड़ा गांवों के ग्रामीणों ने एकजुट होकर विशाल “हलमा” श्रमदान कार्यक्रम आयोजित किया। इस आयोजन में पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया तथा तालाब की टानियों से गाद निकालकर जल संरक्षण का संदेश दिया।
कार्यक्रम में ढोल-कुंडी की थाप और पारंपरिक उत्साह के बीच ग्रामीणों ने करीब तीन घंटे तक लगातार श्रमदान किया। हाथों में तगारी और फावड़े लेकर ग्रामीण तालाब की सफाई में जुटे रहे। तालाब की छोटी-छोटी टानियों से गाद निकालने के साथ आसपास की साफ-सफाई भी की गई। ग्रामीणों की एकजुटता और उत्साह ने पूरे वातावरण को प्रेरणादायी बना दिया।
वाग्धारा संस्था की ब्लॉक सहजकर्ता रेनुका पोरवाल ने जैव-विविधता संरक्षण और आदिवासी पारंपरिक ज्ञान के महत्व पर विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि प्रकृति संरक्षण केवल पर्यावरण बचाने का विषय नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि वाग्धारा संस्था गांव-गांव जाकर समुदाय को जल, जंगल, जमीन और बीज संरक्षण के प्रति जागरूक कर रही है, ताकि लोग अपनी परंपराओं और प्राकृतिक संसाधनों को बचा सकें।
उन्होंने बताया कि “हलमा” केवल श्रमदान नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की एकता और सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतीक है, जहां गांव की छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान पूरा समुदाय मिलकर करता है।
कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों ने आम के पेड़ के नीचे बैठक कर गांव और प्रकृति संरक्षण को लेकर चर्चा भी की। इसके बाद सभी ने मिलकर पारंपरिक तरीके से दाल-चावल बनाकर भोजन किया। ग्रामीणों ने कहा कि “यह हमारी संस्कृति है और हम इसे कभी नहीं भूलेंगे।”
ग्रामीणों ने बताया कि एक-दूसरे को न्योता देकर, हाथों में हाथ मिलाकर और मिट्टी की तगारियां पास करते हुए तालाब सुधार का कार्य किया गया। पूरे आयोजन में सामूहिक सहयोग, भाईचारा और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की अद्भुत तस्वीर देखने को मिली। यह हलमा कार्यक्रम क्षेत्र में सामाजिक एकता और पर्यावरण संरक्षण का प्रेरणादायी उदाहरण बन गया।
रिपोर्टर : जितेन्द्र कुमावत