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स्मृति शेष : श्री बालाराम राणा जिला जनसंपर्क कार्यालय, मंदसौर में कार्यरत सहायक ग्रेड-3 श्री बालाराम राणा अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन का समाचार अत्यंत दुखद और हृदयविदारक है। उनके जाने से जनसंपर्क विभाग ने एक ऐसे कर्मचारी को खो दिया है, जो कर्तव्यनिष्ठा, समर्पण, विनम्रता और सेवाभाव की मिसाल थे। आज के दौर में श्री बालाराम राणा जैसे कर्तव्यपरायण, निष्ठावान एवं समर्पित कर्मचारी बहुत कम देखने को मिलते हैं। श्री राणा ने कुछ वर्षों तक नीमच में मेरे साथ कार्य किया। मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी अनावश्यक अवकाश लिया हो। प्रतिदिन मंदसौर से समय पर आना और अपने दायित्वों का पूरी तत्परता से निर्वहन करना उनके कर्तव्य के प्रति समर्पण का परिचायक था। उनके लिए शासकीय सेवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और निष्ठा का विषय थी। अभावों से संघर्ष कर बनाई अपनी पहचान श्री बालाराम राणा का जन्म मंदसौर जिले के छोटे से ग्राम मजेसरी में एक निर्धन परिवार में हुआ था। अभावों के बीच पले-बढ़े श्री राणा ने गांव के शासकीय विद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और अपने परिश्रम एवं संघर्ष के बल पर स्नातक तक की शिक्षा ग्रहण की। सीधी भर्ती के माध्यम से जनसंपर्क विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में उन्होंने अपने सेवाकाल की शुरुआत की। सीमित संसाधनों और अनेक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और कर्तव्यनिष्ठा से जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास किया। पारिवारिक दायित्वों के साथ शासकीय सेवा के प्रति उनका समर्पण, निष्ठा और तत्परता उन्हें एक आदर्श शासकीय सेवक के रूप में स्थापित करती थी। परिवार के प्रति जिम्मेदारी और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की चिंता श्री राणा ने शासकीय सेवा के साथ-साथ अपने पारिवारिक दायित्वों का भी बखूबी निर्वहन किया। उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान दिया और सीमित वेतन में भी उन्हें बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने का हरसंभव प्रयास किया। स्वयं शासकीय प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा की शुरुआत करने वाले श्री राणा ने अपने बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने बेटे को केंद्रीय विद्यालय में प्रवेश दिलाने के लिए उन्होंने विशेष प्रयास किए और उसकी पढ़ाई की समुचित व्यवस्था की। उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को भी अच्छी शिक्षा दिलाई, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और उनका विवाह संपन्न कराया। आज उनकी बेटियां अपने पैरों पर खड़ी हैं। एक साधारण कर्मचारी के लिए सीमित आय में बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। यह उनके संघर्ष, दूरदर्शिता और परिवार के प्रति समर्पण का प्रमाण है। उन्होंने मंदसौर के अभिनंदन नगर में अपना स्वयं का मकान भी बनवाया। सीमित वेतन और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच अपने परिवार के लिए एक स्थायी आवास की व्यवस्था करना उनके परिश्रम और संकल्प की कहानी कहता है। प्रेस और मीडिया जगत में भी थे लोकप्रिय श्री बालाराम राणा केवल मंदसौर ही नहीं, बल्कि नीमच जिले में अपने सेवाकाल के दौरान भी प्रेस एवं मीडिया के साथियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहे। उनका व्यवहार सहज, सरल और सहयोगात्मक था। किसी ने उनसे कोई कार्य करने के लिए कहा हो और उन्होंने उसके लिए मना किया हो, ऐसा मुझे स्मरण नहीं आता। वे हर व्यक्ति की बात को गंभीरता से सुनते और यथासंभव सहयोग करने का प्रयास करते थे। उनके स्वभाव में न दिखावा था, न अहंकार। वे अपने काम से अपनी पहचान बनाने वाले व्यक्ति थे। उनकी विनम्रता और मिलनसारिता ने उन्हें सहकर्मियों तथा मीडिया जगत के लोगों के बीच विशेष स्थान दिलाया। विभाग और मंदसौर कार्यालय के कुछ कर्मचारी संभव है कि मेरे विचारों से पूरी तरह सहमत न हों, लेकिन मैंने श्री राणा को जितना जाना, समझा और उनके साथ कार्य करते हुए जितना अनुभव किया, उसके आधार पर कह सकता हूं कि वे एक संघर्षशील, जुझारू, संवेदनशील, मिलनसार और समर्पित कर्मचारी थे। ऐसे कर्मचारी आज के दौर में बिरले ही मिलते हैं, जो बिना किसी अपेक्षा के अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए दूसरों के लिए भी सहज उपलब्ध रहें। तुम्हारी कमी हमेशा महसूस होगी, बालाराम! श्री बालाराम राणा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि व्यक्ति की पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि उसके कर्म, व्यवहार और समर्पण से होती है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद से अपनी सेवा यात्रा शुरू करने वाले श्री राणा ने अपने संघर्ष, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से सम्मान अर्जित किया। उन्होंने अपने परिवार को बेहतर भविष्य देने के साथ-साथ अपने कार्यक्षेत्र में भी ऐसी छाप छोड़ी, जिसे भुलाना आसान नहीं होगा। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सादगी, उनका सहयोगी स्वभाव, उनकी कार्यशैली और उनके संघर्ष की कहानी हमेशा स्मृतियों में जीवित रहेगी। उनके साथ बिताए गए पल बार-बार याद आएंगे और उनकी कमी का अहसास होता रहेगा। ऐसे सीधे, सच्चे, विनम्र एवं समर्पित शासकीय सेवक को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। शत-शत नमन। परमपिता परमेश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोकाकुल परिवार को इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति दें। श्री राणा के जीवन और संघर्ष को याद करते हुए ये पंक्तियां बरबस याद आती हैं— जिंदगी अपने अंदाज से जीता हूं मैं, जख्म खाता हूं, अश्क पी लेता हूं मैं। मिलन के घूंघट उठाकर तो देख लेना था, अब रातों में चांद को देख लेता हूं। मिले थे जितने भी जख्म दोस्तों से, अपनों से, अब उन्हीं को फुर्सत में सी लेता हूं मैं। जैसा उनके साथ कार्य करते हुए अनुभव किया, उसी आत्मीयता और सम्मान के साथ उन्हें अंतिम नमन। जगदीश मालवीय आगर-मालवा |