रतलाम । जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा अन्य विभागों में संलग्न शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से उनके मूल विद्यालयों में भेजने के स्पष्ट आदेश जारी किए जाने के बावजूद जिले में कई शिक्षक आज भी तहसील कार्यालय और निर्वाचन शाखा में कार्यरत हैं। वर्षों से चली आ रही यह व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है और शिक्षा व्यवस्था पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है।
14 जुलाई 2026 को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि कार्यालयों संस्थाओं एवं अन्य विभागों में संलग्न सभी शिक्षकों को तत्काल कार्यमुक्त कर उनकी मूल पदस्थापना वाले विद्यालयों में भेजा जाए। साथ ही यह भी कहा गया था कि यदि कोई शिक्षक मूल संस्था में उपस्थित नहीं होता है तो उसका वेतन रोका जाए तथा यह प्रमाणित किया जाए कि कोई भी शिक्षक किसी अन्य विभाग में संलग्न नहीं है।
इसके बावजूद तहसील कार्यालय और निर्वाचन शाखा में वर्षों से कार्यरत शिक्षक आज भी वहीं सेवाएं दे रहे हैं। सूत्रों के अनुसार कई कर्मचारी लंबे समय से अपने मूल विद्यालयों से दूर प्रशासनिक कार्यों में लगे हुए हैं जबकि आदेश का उद्देश्य स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना था।
शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि जिले के कई विद्यालय पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में यदि शिक्षक वर्षों तक गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगे रहेंगे तो विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होना स्वाभाविक है। शासन लगातार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की बात कर रहा है लेकिन दूसरी ओर आदेशों के पालन में लापरवाही चिंता का विषय बनी हुई है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जिला शिक्षा अधिकारी का स्पष्ट आदेश लागू है तो फिर इन शिक्षकों को अब तक मूल पदस्थापना वाले विद्यालयों में क्यों नहीं भेजा गया। आखिर किसके निर्देश या संरक्षण में यह व्यवस्था अब भी जारी है।
स्थानीय लोगों और शिक्षा से जुड़े वर्ग ने मांग की है कि आदेश का तत्काल पालन कर तहसील कार्यालय और निर्वाचन शाखा में वर्षों से कार्यरत सभी शिक्षकों को उनके मूल विद्यालयों में भेजा जाए ताकि विद्यार्थियों को नियमित अध्यापन का लाभ मिल सके और शासन के आदेशों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित हो। साथ ही आदेश की अवहेलना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जाए।
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत