रतलाम / सैलाना। शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने के उद्देश्य से लागू किया गया शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों को निजी विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने का महत्वपूर्ण माध्यम बना है। हालांकि, कानून लागू होने के करीब डेढ़ दशक बाद अब इसकी कई व्यावहारिक विसंगतियां सामने आने लगी हैं, जिनके कारण लाभार्थी परिवार आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं। शिक्षा विशेषज्ञों और अभिभावकों का मानना है कि समय की मांग है कि सरकार इस कानून की समीक्षा कर आवश्यक सुधार करे।
वर्ष 2009 में केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए इस कानून का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को निजी विद्यालयों में पढ़ने का अवसर प्रदान करना था। मध्यप्रदेश में यह कानून वर्ष 2011 से प्रभावी हुआ। इसके तहत प्रत्येक निजी विद्यालय को अपनी प्रवेश स्तर की कक्षा में 25 प्रतिशत सीटें बीपीएल एवं कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य है। इन विद्यार्थियों की फीस की प्रतिपूर्ति सरकार द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार की जाती है।
हालांकि, कानून के तहत केवल शिक्षण शुल्क का भुगतान शासन द्वारा किया जाता है। विद्यालय परिवहन, गणवेश, जूते, स्टेशनरी, पुस्तकें तथा अन्य सहायक गतिविधियों का खर्च अभिभावकों को स्वयं वहन करना पड़ता है। निजी विद्यालयों में यह खर्च प्रतिवर्ष 15 से 20 हजार रुपये तक पहुंच जाता है, जो कई गरीब परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है।
एक अन्य महत्वपूर्ण समस्या यह है कि आरटीई के तहत प्रवेश लेने वाले छात्र को उसी विद्यालय में अंतिम कक्षा तक अध्ययन करना पड़ता है। यदि किसी कारणवश विद्यालय बदलना पड़े तो दूसरे निजी विद्यालय में उसे आरटीई का लाभ नहीं मिल पाता, जिससे कई परिवार परेशान होते हैं।
सेवानिवृत्त प्राचार्य एवं शिक्षाविद् अरविन्द पुरोहित का कहना है कि आरटीई कानून ने शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव अवश्य किए हैं, लेकिन अब इसकी कमियों को दूर करने की आवश्यकता है।
उनका मानना है कि गरीब परिवारों को केवल फीस ही नहीं, बल्कि अन्य आवश्यक शैक्षणिक खर्चों में भी सहायता मिलनी चाहिए।
नई दुनिया वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र त्रिवेदी क्या कहना है कि शिक्षा का अधिकार कानून गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ने का अवसर तो देता है, लेकिन बस शुल्क, यूनिफॉर्म, किताबें और अन्य खर्चे आज भी अभिभावकों को उठाने पड़ रहे हैं। कई गरीब परिवारों के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ बनता जा रहा है। सरकार को आरटीई कानून की समीक्षा कर इन खर्चों को भी सहायता के दायरे में लाना चाहिए। तभी वास्तव में गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और समान शिक्षा का लाभ मिल सकेगा।
प्रदेश में वर्तमान में 8 लाख से अधिक विद्यार्थी आरटीई के तहत निजी विद्यालयों में अध्ययन कर रहे हैं, जबकि रतलाम जिले में भी हजारों बच्चे इस योजना का लाभ ले रहे हैं। ऐसे में अभिभावकों और शिक्षा विशेषज्ञों की मांग है कि सरकार कानून में आवश्यक संशोधन कर इसे और अधिक प्रभावी एवं लाभकारी बनाए, ताकि वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का पूरा लाभ मिल सके।
न्यूज़ स्त्रोत नई दुनिया : वीरेंद्र त्रिवेदी, कैलाश परिहार
रिपोर्टर जितेन्द्र कुमावत