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चीताखेड़ा । जीरन तहसील का ग्राम चीताखेड़ा इस वक्त किसी प्राकृतिक आपदा से नहीं, बल्कि एक अदृश्य कातिल की चपेट में है। यहाँ कैंसर एक महामारी बनकर उभरा है, जिसने गाँव के एक विशिष्ट 200 मीटर के दायरे को अपना निशाना बना लिया है। आलम यह है कि गाँव की गलियों में अब खुशहाली की नहीं, बल्कि मातम और दहशत की गूँज है।* चीताखेड़ा में कैंसर केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि एक आर्थिक और सामाजिक काल बनकर आया है। अपनों को बचाने की जद्दोजहद में ग्रामीणों की उम्र भर की कमाई स्वाहा हो गई है। कई परिवारों की खेती की ज़मीनें बिक चुकी हैं, गहने गिरवी रखे जा चुके हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि अब कई घरों में दो वक्त की रोटी के लाले पड़ गए हैं। किसी ने अपना सहारा (पिता) खोया, तो किसी ने अपनी गोद का लाल (पुत्र)। नवीन कुमार (लोहार)जुणी जैसे पिता का दर्द कलेजा चीर देने वाला है, जिन्होंने अपनी 27 वर्षीय युवा बेटी वनीषा को इस बीमारी के हाथों खो दिया। *नवीन जुणी की मुहिम: अब और कोई परिवार न उजड़े*-- अपनी बेटी वनीषा लोहार को खोने के गम को ताक़त बनाकर नवीन जुणी ने एक साहसिक मशाल जलाई है। वे नहीं चाहते कि जो घाव उनके परिवार को मिला, वह किसी और को मिले। उनकी सक्रियता और ग्रामीणों की एकजुटता ने ही इस मामले को शासन के गलियारों तक पहुँचाया है। जिला कलेक्टर डॉ. हिमांशु चंद्रा को सौंपा गया ज्ञापन केवल एक कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि चीताखेड़ा के अस्तित्व को बचाने की एक आखिरी गुहार है। *संदेह के घेरे में: पानी, जहर या रेडिएशन?* ग्रामीणों ने प्रशासन के सामने तीन गंभीर आशंकाएं जताई हैं, जिनकी तत्काल वैज्ञानिक जांच अनिवार्य है।क्या हैंडपंपों और कुओं के भूजल में घातक कीटनाशक या रासायनिक तत्व घुल चुके हैं? क्या गांव के बीचों-बीच लगे मोबाइल टावर साइलेंट किलर की भूमिका निभा रहे हैं? या आसपास के खेतों में उपयोग होने वाले रसायनों ने पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है? यह समय केवल जांच दल भेजने का नहीं, बल्कि आपातकालीन हस्तक्षेप का है। गांव के हर व्यक्ति की मुफ्त जांच के लिए तत्काल विशेष शिविर लगाए जाना चाहिए। पीड़ित परिवारों को तत्काल वित्तीय सहायता और मुफ्त इलाज की व्यवस्था हो। 200 मीटर के उस डेथ ज़ोन की मिट्टी और पानी की उच्च स्तरीय लैब जांच हो। चीताखेड़ा की सिसकियाँ अब और अनसुनी नहीं की जा सकतीं। प्रशासन को यह समझना होगा कि हर बीतता दिन एक और परिवार के उजड़ने का खतरा लेकर आ रहा है। यह सामूहिक स्वास्थ्य आपातकाल की स्थिति है। *इनका कहना*- मैंने मेरी इस बीमारी में लाखों रुपए खर्च कर दिए। थोड़ी जमीन थी वो भी बेंच दी।अब तो परिवार चलाना भी मुश्किल हो गया है। मैं अकेला कमाने वाला हूं। *पीड़ित सुल्तान शेख, चीताखेड़ा।*- मेरे पति असलम मंसूरी को विगत 3 सालों से केंसर है। इलाज कराते कराते खेत भी बेच दिया है। कोई सुधार नहीं हुआ।अब तो बच्चों का पालन पोषण कैसे करुंगी।मेरी एक बड़ी बेटी आरजू 8 वर्ष और छोटी बेटी अश्विया 6 वर्ष है। मेरे पति अकेले कमाने वाले हैं। प्रशासन से मांग करती हूं कि कुछ सहायता करें। *पीड़िता हुसैना बी शेख, चीताखेड़ा।*- मेरी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है मैं इलाज करवाने में सक्षम नहीं हूं। शासन से अनुरोध है कि इलाज करवाने में सहायता करें। *पीड़ित दुलेसिंह दायमा, चीताखेड़ा।*- रिपोर्ट : दशरथ माली |