चीताखेड़ा । किसान हितैषी होने का दम भरने वाली सरकार का बेनकाब हुआ "असली चेहरा", तकनीक और लेटलतीफी के बीच पिस रहा धरती पुत्र, मंचों से "किसान-हितैषी" होने का दम भरने वाली डबल इंजन सरकार के दावों और हकीकत की जमीन के बीच एक गहरी खाई है। प्रदेश का किसान आज सरकारी सिस्टम की तकनीकी खामियों, प्रशासनिक लेटलतीफी और जनप्रतिनिधियों की बेरुखी की दोहरी मार झेलने को मजबूर है।
उपरोक्त जानकारी ब्लॉक कांग्रेस कमेटी पूर्व अध्यक्ष विनोद दक ने प्रेस विज्ञप्ति में देते हुए बताया है कि ई-उपार्जन से लेकर सम्मान निधि तक, हर स्तर पर किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।
"सैटेलाइट" का अजब खेल: फसल के लिए अंधा, तो पराली पर बाज जैसी नजर
सरकार ने तकनीक का जो मकड़जाल बुना है, उसमें किसान बुरी तरह फंस गया है। ई-उपार्जन पोर्टल पर "सैटेलाइट सत्यापन" अब एक बड़ा मजाक बनकर रह गया है।
*फसल का सच :- खेतों में गेहूं की फसल लहलहा रही है, लेकिन सरकारी सैटेलाइट को वह नजर नहीं आ रही। परिणामस्वरूप, सत्यापन न होने से पोर्टल पर स्लॉट बुकिंग की प्रक्रिया बाधित है।
दंडात्मक मुस्तैदी :- हैरानी इस बात की है कि यही सैटेलाइट जहां किसान को मदद देने की बात आती है, वहां "अंधा" हो जाता है, लेकिन अगर खेत में पराली जल जाए, तो इसकी नजर तुरंत कार्रवाई के लिए पहुंच जाती है। क्या यह तकनीक का उपयोग है या किसानों को परेशान करने की सोची-समझी साजिश?
सम्मान निधि का "सम्मान" ही गायब
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि को लेकर बड़े-बड़े विज्ञापनों का शोर मचाने वाली सरकार अब मौन है। मार्च का महीना बीत जाने के बाद भी लाखों किसानों के खातों में सम्मान निधि की किस्त नहीं पहुँची है। चुनाव में "किसान का बेटा" बताने वाले नेता आज चुप्पी साधे हुए हैं। किसानों का साफ कहना है कि समय पर पैसा न देना सहायता नहीं, बल्कि उनका अपमान है।
सिस्टम की गलती, किसान पर दंड!
श्री दक ने कहा कि सरकार ने कर्ज वसूली की अंतिम तिथि 30 मार्च तय कर दी, जबकि पोर्टल की तकनीकी खामियों के चलते किसान अपनी फसल बेच ही नहीं पाया।
नतीजा: हजारों किसान "जीरो प्रतिशत ब्याज" योजना का लाभ लेने से वंचित रह गए।
मजबूरी: अपनी साख (Credit Score) बचाने के लिए किसान साहूकारों से भारी ब्याज पर कर्ज लेकर बैंक का मूलधन चुकाने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि यदि गलती सरकारी सिस्टम की है, तो किसान को दंड क्यों भुगतना पड़ रहा है?
श्री दक ने कहा कि
"शेर" जैसे भाषण, "ढेर" जैसा काम: जनप्रतिनिधियों की चुप्पी
वोट मांगने के समय मंचों पर शेर की तरह दहाड़ने वाले भाजपा के नेता और विधायक आज नदारद हैं। जब किसान स्लॉट बुकिंग और फसल बेचने के लिए दर-दर भटक रहा है, तो ये जनप्रतिनिधि अपने घरों में दुबक गए हैं। सरकार की नीतियां केवल कागजों और विज्ञापनों तक सीमित होकर रह गई हैं।
चेतावनी: सरकार के लिए किसान केवल एक "वोट बैंक" बनकर रह गया है। यदि समय रहते इन तकनीकी और प्रशासनिक त्रुटियों को दूर नहीं किया गया, तो किसान का यह आक्रोश आने वाले समय में सत्ता के गलियारों तक गूंजेगा।
रिपोर्ट : दशरथ माली