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आवाज में गुस्सा भी था और बेबसी भी। शब्दों में विरोध था लेकिन उसके पीछे एक डर साफ झलक रहा था अपनी जमीन का अपने जंगल का अपने अस्तित्व का। केन-बेतवा परियोजना को लेकर जिस तरह से लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं वह सिर्फ एक विकास परियोजना के खिलाफ विरोध नहीं है बल्कि यह उस टकराव की कहानी है जहां विकास और विस्थापन आमने-सामने खड़े हैं। सरकार कह रही है यह परियोजना बुंदेलखंड की तस्वीर बदल देगी। पानी आएगा खेत लहलहाएंगे सूखा इतिहास बन जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ खड़े लोग पूछ रहे हैं किस कीमत पर क्या हमारी जमीन, हमारे जंगल हमारी पहचान इस विकास की बलि चढ़ जाएगी आज हालात यह हैं कि गांव-गांव में लोग इकट्ठा हो रहे हैं। हाथों में तख्तियां हैं गुस्सा है और एक सवाल क्या हमें पूछे बिना हमारे भविष्य का फैसला किया जा सकता है प्रदर्शन कर रहे लोगों की आवाज साफ है हमें विकास चाहिए लेकिन विनाश नहीं।केन-बेतवा परियोजना का कागजी सपना भले ही बहुत आकर्षक लगे लेकिन जमीन पर इसकी हकीकत उतनी ही जटिल है। जिन क्षेत्रों में यह परियोजना लागू होनी है वहां के लोगों के सामने सबसे बड़ा संकट विस्थापन का है। पीढ़ियों से जहां उनका घर है, जहां उनकी यादें हैं, जहां उनकी पहचान है उसे छोड़कर वे कहां जाएंगे सरकार मुआवजे की बात करती है पुनर्वास की योजनाओं का जिक्र करती है लेकिन ग्रामीणों का भरोसा इन वादों पर नहीं बन पा रहा। उनका कहना है कि पहले भी कई परियोजनाओं में ऐसे वादे किए गए, लेकिन बाद में लोग दर-दर भटकते रह गए।बाईट में एक बुजुर्ग की आवाज खास तौर पर दिल को छूती है हमने जंगल बचाया नदी बचाई, अब हम खुद को कैसे बचाएं यह सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं बल्कि उन हजारों लोगों का है जो इस परियोजना की चपेट में आने वाले हैं। एक तरफ सरकार “जल क्रांति की बात कर रही है और दूसरी तरफ उसी पानी के नाम पर लोगों की जिंदगी सूखने की कगार पर है। विकास का यह मॉडल आखिर किसके लिए है क्या यह केवल आंकड़ों और रिपोर्टों में अच्छा दिखने के लिए है, या वास्तव में लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों में केवल किसान ही नहीं हैं बल्कि आदिवासी समुदाय भी बड़ी संख्या में शामिल हैं। उनके लिए यह सिर्फ जमीन का मुद्दा नहीं बल्कि संस्कृति और परंपरा का सवाल भी है। जंगल उनके लिए सिर्फ पेड़ नहीं बल्कि जीवन का आधार है। सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। एक तरफ परियोजना को जल्द से जल्द पूरा करने का दबाव है और दूसरी तरफ बढ़ता जनविरोध। अगर इस विरोध को नजरअंदाज किया गया, तो यह आने वाले समय में और बड़ा रूप ले सकता है।यहां सवाल यह नहीं है कि केन-बेतवा परियोजना जरूरी है या नहीं। सवाल यह है कि क्या इसे लागू करने का तरीका सही है क्या प्रभावित लोगों की सहमति ली गई है क्या उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुना गया है लोकतंत्र में विकास का मतलब केवल बड़े प्रोजेक्ट खड़े करना नहीं होता बल्कि यह सुनिश्चित करना भी होता है कि उस विकास में कोई पीछे न छूटे। अगर विकास कुछ लोगों के लिए खुशहाली और कुछ के लिए तबाही लेकर आता है, तो उस विकास पर सवाल उठना लाजमी है। बाईट में बार-बार एक ही बात दोहराई जा रही थी“हम अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। यह जिद नहीं है यह मजबूरी है। क्योंकि जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं होती वह जीवन होती है।सरकार को यह समझना होगा कि केवल योजनाओं का ऐलान करना काफी नहीं है। लोगों के विश्वास को जीतना उससे भी ज्यादा जरूरी है। अगर लोगों को यह भरोसा नहीं होगा कि उनके साथ न्याय होगा, तो विरोध स्वाभाविक है।आज केन-बेतवा परियोजना एक परीक्षा बन चुकी है सरकार के लिए भी और समाज के लिए भी। यह तय करेगा कि हम विकास को किस नजर से देखते हैं संवेदनशीलता के साथ या सिर्फ आंकड़ों के खेल के रूप में। प्रदर्शन केवल विरोध नहीं होते, वे संवाद का एक माध्यम भी होते हैं। अगर सरकार इन आवाजों को सुन ले, समझ ले और सही समाधान निकाल ले तो यह परियोजना सच में एक मिसाल बन सकती है। लेकिन अगर इन आवाजों को दबाने की कोशिश की गई, तो यही विरोध एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है। क्योंकि याद रखिए जब पानी का सवाल होता है तो सिर्फ नदियां नहीं बहतीं आवाजें भी बहने लगती है और फिर उन्हें रोक पाना आसान नहीं होता। रिपोर्ट: वसीम अली |