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वॉशिंगटन/तेहरान। अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ते तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच सीधा युद्ध अभी तक नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई बड़े रणनीतिक और वैश्विक कारण हैं, जिनके चलते अमेरिका सीधे सैन्य कार्रवाई से बच रहा है। सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट में व्यापक युद्ध का खतरा है। ईरान के समर्थन वाले संगठन जैसे हिज़्बुल्लाह और हूती विद्रोही किसी भी हमले की स्थिति में सक्रिय हो सकते हैं, जिससे संघर्ष कई देशों तक फैल सकता है। ऐसे हालात में इज़राइल और खाड़ी देशों की भी सीधी भागीदारी की आशंका बढ़ जाती है। दूसरी अहम वजह ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। JCPOA को लेकर पहले से ही विवाद बना हुआ है। विश्लेषकों के अनुसार, यदि अमेरिका सीधा हमला करता है तो ईरान परमाणु हथियार निर्माण की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ा सकता है, जिससे वैश्विक सुरक्षा संकट गहरा सकता है। आर्थिक मोर्चे पर भी जोखिम कम नहीं है। मिडिल ईस्ट तेल आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है। युद्ध की स्थिति में सप्लाई बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ अमेरिका पर भी पड़ेगा। अमेरिका की आंतरिक राजनीति भी एक महत्वपूर्ण कारक है। इराक और अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्धों के बाद वहां की जनता और राजनीतिक नेतृत्व नए बड़े सैन्य संघर्ष से दूरी बनाए रखना चाहते हैं। सैन्य दृष्टि से भी ईरान ने खुद को “असिमेट्रिक वॉरफेयर” में मजबूत किया है। मिसाइल, ड्रोन और साइबर हमलों के जरिए वह सीधे युद्ध के बिना भी गंभीर नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। इसके अलावा रूस और चीन जैसे देशों का समर्थन भी ईरान को कूटनीतिक मजबूती देता है, जिससे अमेरिका के लिए स्थिति और जटिल हो जाती है। निष्कर्ष: विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के पास सैन्य क्षमता जरूर है, लेकिन संभावित नुकसान और वैश्विक असर को देखते हुए वह सीधे युद्ध से बचते हुए दबाव और कूटनीति की रणनीति पर अधिक भरोसा कर रहा है। |