इंदौर / रतलाम
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में माननीय न्यायमूर्ति श्री विवेक रूसिया की एकलपीठ ने एक लंबे समय से लंबित सेवा मामले में याचिकाकर्ता गंगाराम के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। रिट याचिका क्रमांक 2358/2015 में न्यायालय ने नगर पंचायत सैलाना (जिला रतलाम) को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 07 अक्टूबर 2016 की राज्य सरकार की स्थाई कर्मी (Sthai Karmi) नीति के तहत पूर्ण लाभ प्रदान किए जाएं जिसमें वेतन वरिष्ठता और अन्य सेवा संबंधी सुविधाएं शामिल हैं। पूरा आदेश 60 दिनों के अंदर लागू करना होगा।
गंगाराम जो पिछड़ा वर्ग से हैं और 40% दिव्यांगता से ग्रस्त हैं ने हायर सेकेंडरी परीक्षा उत्तीर्ण की हुई है।
उन्हें 1 सितंबर 1989 को दैनिक वेतनभोगी (Daily Wager) कुशल कर्मचारी के रूप में नगर पंचायत सैलाना में नियुक्त किया गया था। वे लगातार सेवा देते रहे लेकिन वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश सरकार के सभी दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को हटाने के फैसले में उनकी सेवा भी समाप्त कर दी गई। इसके बाद उन्होंने श्रम न्यायालय में मुकदमा दायर किया, जहां 21 दिसंबर 2004 के फैसले से उन्हें पुनः सेवा में बहाल कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने बार-बार LDC (लोअर डिवीजन क्लर्क) पद पर नियमितीकरण
(Regularization) की मांग की, क्योंकि वे उस पद के लिए पूर्ण रूप से योग्य थे। उनके कई जूनियर कर्मचारियों को नियमित कर दिया गया, लेकिन उनके मामले को सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध उमा देवी मामले (2006) का हवाला देकर नजरअंदाज कर दिया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि उनकी नियुक्ति रिक्त पद पर हुई थी और वे आवश्यक योग्यता रखते थे, इसलिए इसे अवैध नहीं माना जा सकता।
प्रतिवादी पक्ष (नगर पंचायत सैलाना मुख्य नगर पालिका अधिकारी और कलेक्टर रतलाम) ने गंगाराम पर गंभीर आरोप लगाए—विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन न करना नियमित स्वीकृत पद पर नियुक्ति न होना कार्य संतोषजनक न होना भ्रष्टाचार और महिला कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार।
इन्हीं आधारों पर नियमितीकरण को अस्वीकार कर दिया गया था।
न्यायालय ने आरोपों को खारिज किया
माननीय न्यायमूर्ति विवेक रूसिया ने अपने विस्तृत आदेश में इन आरोपों को गंभीरता से लिया लेकिन पाया कि ये आरोप याचिकाकर्ता की आवेदन अस्वीकृति के समय पहली बार लगाए गए। इनकी कोई विधिवत जांच नहीं हुई। न्यायालय ने तीखा टिप्पणी करते हुए पूछा— यदि आरोप सही भी थे तो इन्हें इतने लंबे वर्षों तक सेवा में क्यों रखा गया? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे आरोप स्थाई कर्मी का लाभ रोकने के लिए बाद में लगाए गए बहाने प्रतीत होते हैं और इन्हें मान्य नहीं ठहराया जा सकता।
न्यायालय ने राज्य सरकार की 07.10.2016 की नई नीति को आधार बनाया जो पिछली सभी नीतियों को निरस्त करती है और सुप्रीम कोर्ट के राम नरेश रावत मामले (2017) के अनुरूप है। इस नीति के तहत लंबे समय से निरंतर सेवा देने वाले दैनिक वेतनभोगियों को स्थाई कर्मी का दर्जा मिलना चाहिए। कोर्ट ने माना कि श्रम न्यायालय के आदेश के कारण 2000 से 2004 तक की सेवा अवधि में कोई ब्रेक नहीं माना जाएगा। गंगाराम की लगातार सेवा और योग्यता को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने उन्हें पूर्ण लाभ देने का आदेश दिया।
प्रभाव और महत्व
यह फैसला उन हजारों दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए राहत की किरण है जो दशकों से अनिश्चितता में जी रहे हैं। मध्य प्रदेश में स्थाई कर्मी नीति लागू होने के बावजूद कई स्थानीय निकायों में नियमितीकरण की प्रक्रिया लंबित या विवादास्पद रही है।
न्यायमूर्ति रूसिया की पीठ ने साफ किया कि उमा देवी का फैसला नियमितीकरण से इनकार करने का हथियार नहीं बन सकता खासकर जब कर्मचारी वर्षों से रिक्त पदों पर कार्यरत रहा हो और राज्य की नीति उसे लाभ देने के लिए बनी हो।
याचिका के निपटारे के साथ हाईकोर्ट ने नगर पंचायत सैलाना, मुख्य नगर पालिका अधिकारी और कलेक्टर रतलाम को स्पष्ट निर्देश दिए कि 60 दिनों के अंदर आदेश का पालन करें अन्यथा याचिकाकर्ता को कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता रहेगी।
यह आदेश 23 अप्रैल 2026 को सुनाया गया। प्रमाणित प्रति मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की प्रधान प्रतिलिपिकार श्रीमती प्राचिती ताराणेकर द्वारा जारी की गई है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की सत्यता का प्रमाण शामिल है।
सामाजिक आयाम
गंगाराम जैसे दिव्यांग और पिछड़े वर्ग के कर्मचारी के लिए यह फैसला सिर्फ सेवा नियमितीकरण नहीं बल्कि लंबे संघर्ष के बाद मिला न्याय है। 1989 से शुरू हुई उनकी यात्रा में 2000 का ब्रेक श्रम अदालत की लड़ाई, बार-बार आवेदन और अंततः हाईकोर्ट तक का सफर कई कर्मचारियों की कहानी को प्रतिबिंबित करता है।
नगर पंचायत सैलाना अब 60 दिनों में वेतन संशोधन वरिष्ठता निर्धारण और अन्य लाभों का भुगतान सुनिश्चित करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अन्य लंबित मामलों में भी मिसाल बनेगा, जहां स्थानीय निकाय दैनिक वेतनभोगियों के अधिकारों को टालते रहे हैं।
निष्कर्ष
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय इंदौर की इस पीठ ने एक बार फिर साबित किया कि न्याय व्यवस्था में लंबी सेवा योग्यता और राज्य नीति का सम्मान सर्वोपरि है। गंगाराम की जीत न केवल व्यक्तिगत है बल्कि पूरे अनियमित रोजगार व्यवस्था से जूझ रहे कर्मचारियों के लिए एक मजबूत संदेश है—न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन इनकार नहीं।
रिपोर्टर जितेंद्र कुमावत