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म.प्र. जन अभियान परिषद जिला नीमच द्वारा आदि गुरू शंकराचार्य जी के जन्म जयंति सप्ताह अंतर्गत जिला स्तरीय व्याख्यानमाला का आयोजन श्री सत्यनारायण मंदिर स्कीम नंबर 9 में आयोजित किया गया। आयोजन में मुख्य अतिथि सत्यनारायण मंदिर के श्री नृत्यबिहारी दासजी, स्वर्णकार समाज अध्यक्ष एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्री जितेन्द्र सोनी, सेवा भारती के सह सचिव श्री राजेश जयसवाल एवं जिला समन्वयक वीरेन्द्र सिंह ठाकुर द्वारा शंकराचार्य जी का पूजन अर्चन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। अतिथियों का स्वागत परामर्शदाता कोमल भट्ट, प्रियंका शर्मा एवं नवांकुर संस्था प्रभारी विकास शर्मा ने किया। जिला समन्वयक वीरेन्द्र सिंह ठाकुर ने स्वागत उदबोधन एवं इस कार्यक्रम के आयोजन के उदेश्य, आवश्यकता एवं महत्व से सभी को अवगत कराया गया। नृत्यबिहारी दास जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य के मतानुसार हमें श्रवण, मनन तथा ज्ञान का चिंतन करना अत्यंत आवश्यक है। सनातन धर्म का उत्थान केवल ज्ञान के माध्यम से ही संभव है। शंकराचार्य जी के अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को समझना आज के समय में बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि वैदिक सिद्धांतों के विपरीत कोई भी मार्ग नहीं जा सकता। हमारे पास अनेक दर्शन हैं (मुख्यतः नौ दर्शन), जिन्हें जानना और समझना आवश्यक है। विशेष रूप से हमें शंकराचार्य जी के एकात्म दर्शन को आत्मसात करना चाहिए, क्योंकि वही जीवन को सत्य और एकता की दिशा में ले जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि हम धर्म को केवल आडंबर और दिखावे के रूप में अपनाएंगे, तो सनातन धर्म का उत्थान नहीं होगा, बल्कि उसका पतन निश्चित होगा। सनातन धर्म की वास्तविक शक्ति ज्ञान, साधना और आत्मचिंतन में है। आज हम एक बड़ा विरोधाभास जी रहे हैं। एक ओर हम नदियों को “माता” कहकर पूजते हैं, और दूसरी ओर पूजा-सामग्री, प्लास्टिक की थैलियाँ, फूल-मालाएँ, मूर्तियाँ और कचरा उन्हीं नदियों में डालकर उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं। यह केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति और धार्मिक चेतना पर भी प्रश्नचिह्न है। पूजा का उद्देश्य शुद्धि, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति सम्मान होता है, लेकिन जब पूजा के नाम पर हम प्रकृति को ही नुकसान पहुँचाते हैं, तो यह धर्म नहीं बल्कि आडंबर बन जाता है। वास्तविक संस्कृति वही है जो प्रकृति की रक्षा करे, न कि उसे दूषित करे। इसलिए हमें इस विषय पर गंभीर मनन और चिंतन करना होगा कि हम अपने धार्मिक कार्यों को परंपरा के साथ-साथ जिम्मेदारी और विवेक के साथ कैसे करें। नदी की पूजा तभी सार्थक है जब नदी स्वच्छ और सुरक्षित रहे। श्री राजेश जयासवाल ने धर्मअनुरूप सेवाकार्यो के माध्यम से जीवन को सफल बनाने हेतु मार्गदर्शन दिया। संचालन पवन कुमरावत ने किया एवं आभार विख समनवयक महेन्द्रपाल सिंह भाटी ने किया। |